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Friday, June 2, 2023

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कलार तोड़ने लगी दम, पारंपरिक परंपरा खोने का डर

गांवों में कृषि कार्य से निवृत होने के बाद किसान पशु चारा को लम्बे समय तक सहेजने का काम करते है। इसमें आस पास के लोग मिलकर सहयोग करते है। सभी एक-दूसरे के चारा भंडारण में सहयोग करते हैं। चारा भंडारण की इस कला को पूर्ण रूप से मूर्त रूप देने वाले को ‘कड़िया’ कहा जाता है। धवा में चारे का भंडारण करते किसान ने बताया कि पशुओं के लिए चारा भंडारण की पारंपरिक कला ‘कलार’ अब दम तोड़ने लगी है। चारा भंडारण की इस पारंपरिक एवं कलात्मक विधि को साधारण भाषा में कलार कहा जाता है। इसी कलार के रूप में किसान चारा का भंडारण करते रहे है, इससे लम्बे समय तक चारा ताजा एवं रसीला रहता है। चारे की कमी या अकाल के समय पशु पालक भंडारण किए गए चारे का उपयोग करते है, जिससे पशुधन को बचाया जा सके। वर्तमान में कच्चे व पक्के निर्माण से बड़े बड़े हॉल शैड बनाकर उसमें चारा जमा किए जाने से इस कला का उपयोग कम होने लगा है, वही चारा भंडारण की कलात्मक विधि बड़ी जटिल है। पहले जमीन समतल कर उस पर घास फूस और कंटीली झाड़ियों से एक बड़ा आकार में गोल घेरा बनाते है। उस गोल घेरे में बाजरा, मूंग, मोठ, ज्वार, ग्वार आदि का सूखा चारा भरा जाता है। गोल घेरे के चारों तरफ किनारे पर इसी घास फूस का ऊपरी घेरा बनाते चलते है और खाली घेरे में चारा भरते रहते है। इसे कलार कहते है। कलार के ऊपर पांच छह किसान रहते है जो चारे को घेरे में दबाकर व्यवस्थित गोल आकार देते है। एक कलार बीस फीट से भी अधिक ऊंचाई में हो सकती है बड़ी कलार में एक सौ किं्वटल से भी अधिक चारा भंडारण हो जाता है। कलार के ऊपरी भाग को नुकीला व ढलान का आकार देकर घास से इस प्रकार सजाया जाता है जिससे बरसात का पानी चारे में ना घुस पाये।

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